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physics important question class 11th final exam 2020 mp board unit 1

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अध्याय 1 - भौतिक जगत एवं मात्रक और मापन


प्रश्न 1. सिद्धान्त तथा नियम में अन्तर स्पष्ट कीजिए ।
👇 Answer is
उत्तर -जब किसी परिकल्पना से सम्बन्धित निष्कर्ष तथा भविष्यवाणियों का प्रयोगों द्वारा सत्यापन ही जाता है, तो उस परिकल्पना को सिद्धान्त का रूप दे देते हैं, अन्यथा उस परिकल्पना में संशोधन करके या पूर्णतः नवीन परिकल्पना की स्थापना करके व उसकी सत्यता का कुछ परीक्षण करके सिद्धान्त बनाया जाता है। इस प्रकार, प्रयोगों द्वारा सत्यापित परिकल्पना को सिद्धान्त कहते हैं। उपर्युक्त सिद्धान्त कुछ सीमित घटनाओं, प्रेक्षणों तथा तथ्यों के लिए ही सत्य हो सकता है या सभी घटनाओं, प्रेक्षणों तथा तथ्यों के लिए भी सत्य हो सकता है। जब प्रतिपादित सिद्धान्त सभी घटताओं, प्रेक्षणों तथा तथ्यों के लिए सत्य होता है, तो इसको नियम कहा जाता हैं। सिद्धान्त को संशोधित किया जा सकता है तथा इसमें परिवर्तन ( संशोधन) करके या नवीन सिद्धान्त स्थापित करके तथा उसकी सत्यता को परखकर, नियम स्थापित किया जाता हैं, जबकि नियम में कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता है।








प्रश्न 2. वैज्ञानिक विधि क्या होती है ? इसके मुख्य चरणों को लिखिए।

👇 Answer is
उत्तर-वैज्ञानिक विधि- अनुसन्धान कार्यों के लिए अपनायी जाने वाली सुव्यवस्थित, क्रमबद्ध एवं तर्कसंगत विधि को वैज्ञानिक विधि कहा जाता है। वैज्ञानिक विधि के मुख्य चरण-वैज्ञानिक विधि के निम्नलिखित पाँच चरण होते हैं- (i) क्रमबद्ध प्रेक्षण, (ii) परिकल्पना की स्थापना, (iii) परिकल्पना की सत्यता का परीक्षण, (iv) सिद्धान्त की स्थापना, तथा (v) नियम की स्थापना।








प्रश्न 3. विमीय समीकरण किसे कहते हैं ? इसके उपयोग लिखिए (कोई चार) है ।

👇 Answer is
उत्तर- मूल तथा व्युत्पन्न मेत्रकों के बीच सम्बन्ध को समीकरण के रूप में प्रदर्शित करना विमीय समीकरण कहलाता है। विमीय समीकरणों के उपयोग- (i) किसी भौतिक राशि का मात्रक ज्ञात करना। (ii) किसी भौतिक राशि के मात्रक को एक पद्धति से दूसरी पद्धति में बदलना। (iii) किसी समीकरण की सत्यता की जाँच करना। (iv) विभिन्न भौतिक राशियों में सम्बन्ध स्थापित करना। विमीय समीकरण की सीमाएँ- (i) इनके द्वारा विमाहीन नियतांकों के मान ज्ञात नहीं किए जा सकते। (ii) यदि कोई भौतिक राशि तीन से अधिक मूल राशियों पर निर्भर करती है तो इनके बीच सम्बन्ध स्थापितं नहीं किया जा सकता। (iii) ऐसे सूत्र को स्थापित नहीं किया जा सकता है जिसमें एक से अधिक राशियों का योग या अन्तर होता है। (iv) ऐसे सूत्रों का विश्लेषण नहीं किया जा सकता जिनमें त्रिकोणमितीय, लघुगणकीय तथा चर घातांकी पद उपस्थित होते हैं।








प्रश्न 4. S. I. पद्धति से आप क्या समझते हैं ? इसकी पद्धति में मूल मात्रकों एवं पुरक मात्रकों के नाम लिखिए एवं इनके संकेत बताइए।

👇 Answer is
उत्तर-यह एक अन्तर्राष्ट्रीय मानक पद्धति है जो M. K. S. पद्धति का परिवर्द्धित रूप है। इस पद्धति में कुल सात मूल राशियाँ तथा दो पूरक मूल राशियाँ मानी जाती हैं जिनके सात मूल मात्रक व दो पूरक मूल मात्रक होते हैं।








प्रश्न 5. सार्थक अंकों से क्या तात्पर्य है ? किसी राशि में सार्थक अंकों की गिनती किस प्रकार की जाती है ?

👇 Answer is
(B) सार्थक अंक-"किसी राशि की माप में यथार्थतापूर्वक ज्ञात अंकों को सार्थक अंक कहते हैं।" जैसे-वर्नियर कैलीपर्स से नापी गई लम्बाई 2.30 सेमी में 3 सार्थक अंक हैं। सार्थक अंकों की गिनती करना-किसी राशि में सार्थक अंकों की गिनती करने में निम्नलिखित बातों का ध्यान रखा जाता है- (i) राशि के सार्थक अंकों की संख्या पर दशमलव की स्थिति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, जैसे 4.35, 43.5 व 435 तीनों ही राशियों में सार्थक अंकों की संख्या 3 है। (ii) मात्रक बदलने पर राशि के सार्थक अंकों की संख्या नहीं बदलती है। जैसे-24.5 सेमी को 245 मिमी या 0.245 मीटर भी लिख सकते हैं, लेकिन प्रत्येक स्थिति में सार्थक अंकों की संख्या 3 ही है। (iii) दो अशून्य संख्याओं के बीच के सभी शून्य, सार्थक अंक होते हैं। जैसे-300.02 के सार्थक अंक 5 हैं। (iv) यदि दशमलव के पूर्व कोई अशून्य संख्या है तो दशमलव के बाद के सभी शून्य, सार्थक अंक होते हैं। जैसे-2.0042 में सार्थक अंक 5 हैं। (v) अन्तिम अशून्य संख्या के दायीं ओर के सभी शुन्य, सार्थक अंक नहीं होते हैं। जैसे-2500 में सार्थक अंक 4 हैं। (vi) प्रथम अशून्य संख्या के बायीं ओर के सभी शून्य, सार्थक अंक नहीं होते हैं। जैसे- 0-002500 में केवल 4 सार्थक अंक हैं। (C) हल : (i) 385000 = 3.85 x 105 = 10¹ x 105 = 106 (ii) 0.0008 = 8 x 10-4 = 10¹ x 10-4= 10-³ उत्तर










प्रश्न 6. विमीय विधि से समीकरण S= ut+½+ at² की शुद्धता की जाँच कीजिए ।

👇 Answer is
उत्तर- समीकरण में प्रयुक्त प्रतीकों के मान विमाओं के रूप में इस प्रकार हैं- विस्थापन S = L,वेग u = LT-¹,त्वरण a = LT-²,समय t = T तथा ½ विमाहीन है। समीकरण S = ut + ½ at² में विमाओं के मान रखने पर, L = LT-¹T + ½ LT-²T² L = L + ½L L = L =³/2L अर्थात् दोनों पक्षों में मूल मात्रकों की विमाएँ समान हैं, अत: समीकरण शुद्ध है।








प्रश्न 7. विमीय विधि से समीकरण T = 2π√l/g की शुद्धता की जाँच कीजिए।
👇 Answer is
उत्तर उत्तर-समीकरण में प्रयुक्त प्रतीकों के मान विमाओं के रूंप में इस प्रकार हैं- T = T, I = L, g = LT-² तथा 2n विमाहीन नियतांक है। समीकरण T = 2π√l/g में विमाओं के मान रखने पर, T = √L/LT-² T = √LT-²/L T = T अर्थात् दोनों पक्षों में मूल मात्रकों की विमाएँ समान हैं, अत: समीकरण शुद्ध है ।




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